Why so serious?
Posted: January 28th, 2009 | Author: Rohit | Filed under: Poetry | 1 Comment »मेरी बातों को कह कर बेकार की बातें
चळी जाएगी वो इस बात से घबराता हूं
इसी लिए मै अक्सर खामोश रहता हूं
इसी लिए मै चुपचाप मुस्कुराता हूं
एक मुद्त से लड़ रहा हूं मै
मुझको यह फ़ैसला मंज़ूर नहीं
माना फ़िलहाल बेढ़ियों में हूं
पर ख्वाबों का जहां दूर नही.
मेरी दुनिया को कह कर ख्वाब की दुनिया
चळी जाएगी वो इस बात से घबराता हूं
इसी लिए मै अक्सर खामोश रहता हूं
इसी लिए मै चुपचाप मुस्कुराता हूं
मेरे बाप का सच्चा मगर हताश चेहरा
और मां की नेक पर मजबूर हस्ती
वो चंद सरफ़िरे से दोस्त
एक छोटा सा घर और तंग बस्ती
मेरे माज़ी को कह कर बेकार का बोझा
चळी जाएगी वो इस बात से घबराता हूं
इसी लिए मै अक्सर खामोश रहता हूं
इसी लिए मै चुपचाप मुस्कुराता हूं

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